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बिखरॆ सुर

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बिखरॆ सुर

प्रसिद्ध टीवी सीरियल बालिका वधू की सह-लेखक की कलम से नियति का मन अनगिनत सपनों और आशाओं से भरा है। लेकिन एक टूटते हुए घर में बड़ा होना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। उसकी जि़न्दगी एक जिंग्साॅ पज़ल सरीखी होती जा रही है जिसके टुकड़े कभी मिलकर एक नहीं होते।

उसके दिन घुटते हैं व्यभिचारी पिता के ढ़़ोंग, माँ की खौलती ख़ामोशियों और निजी अनिश्चितता के सायों तले जहाँ अपने पड़ोसी ढीठ चंदन की उपिस्थिति उसे परेशान करती है, वहीं बड़ी बहन निशा को देखते ही उसके दिल को सुकून मिलता है।

दस साल बड़ी निशा उसके जीवन का पारस पत्थर है। पर निशा के एक राज़ के खुलते ही नियति का विश्वास पलट जाता हैे और वह निकल पड़ती है अपने आप को ढ़ूँढने।

सत्तर और अस्सी के दशक की दिल्ली में रची बसी बिखरे सुर हमारी जि़न्दगियों में खूबसूरती की तलाश की एक बेहद संवेदनशील कहानी है।
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