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कोरा कागज़ (An Extract)

निष्ठा और अविनाश की मुलाकातों का सिलसिला शुक्ल पक्ष के चाँद की तरह बढऩे लगा था। छाया के पाँव का प्लास्टर अब उतर चुका था और उसने फिर से शांति प्रकाशन जाना शुरू कर दिया था। निष्ठा अविनाश के प्रोजेक्ट में बेझिझक उसकी सहायता करने तकरीबन हर रोज उसके घर चली जाती। निष्ठा के लगातार प्रयत्न से अविनाश की हिंदी जुबान अब काफी साफ हो गई थी और निष्ठा इस सुधार पर यदा-कदा अविनाश को दाद देती रहती थी कि अब तुम खिचड़ी भाषा का प्रयोग नहीं करते।
कुछ दिनों में जब अविनाश पूरी तरह स्वस्थ हो गया, तब वे दोनों इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मिलकर प्रोजेक्ट के तहत योजनाएँ बनाते। निष्ठा ने अविनाश को उसकी परियोजना के लिए न केवल महत्त्वपूर्ण और रुचिकर प्रस्ताव दिए, बल्कि कुशलतापूर्वक उस परियोजना को अंतिम अंजाम देने में भी परिपूर्णता और कुशलता से योगदान दिया, जिसके परिणामस्वरूप शांति प्रकाशन ने प्रतिभाशाली युवाओं के लिए एक ‘विचार और गोष्ठी’ मंच का निर्माण किया। इस मंच में अनेक युवक-युवतियों को अपनी लेखन-प्रतिभा और साहित्यिक शैली प्रस्तुत करने का अवसर मिला।
निष्ठा के सुझावानुसार अविनाश ने विजेताओं को सामाजिक, मनोवैज्ञानिक व आध्यात्मिक विषयों पर लेख, कविताएँ या उपन्यास लिखने का निमंत्रण दिया। निष्ठा ने अविनाश को यह सुझाव यह सिद्ध करने के लिए भी दिया था कि हमारे देश के लेखक विदेशी लेखकों से कम नहीं हैं और वे भी ‘चिकन सूप फॉर द सोल’ (जिसका जिक्र अविनाश उससे यदा-कदा करता रहता था) प्रकार की पुस्तकें लिख सकते हैं। हालाँकि, अविनाश ने निष्ठा की लिखी जितनी भी कविताएँ पढ़ी थीं, उनमें आत्मिकता की झलक महसूस की थी; पर उसके लाख चाहने पर भी निष्ठा ने किसी प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया और बार-बार यही कहती रही कि वह सिर्फ अपनी खुशी के लिए लिखती है। अपनी कविताओं का प्रचार या उन्हें प्रकाशित करने में उसको कोई रुचि नहीं है।
अविनाश ने मन-ही-मन प्रण किया कि वह एक दिन जरूर निष्ठा की इस मनोग्रंथि को मिटाकर रहेगा। एक साथ कई दिनों तक काम करते-करते अविनाश व निष्ठा की मित्रता और भी घनिष्ठ हो गई थी। हर मुलाकात में दोनों के व्यक्तित्व की बाहरी परतें जैसे उतरती जा रही थीं और वे एक-दूसरे की आंतरिक सुंदरता व निर्मलता को न केवल करीब से पहचानने लगे, बल्कि एक-दूसरे के मन की बात बिना कहे ही समझने भी लगे थे।
शांति प्रकाशन में अविनाश के पिता और छाया के अफसर रवि राय, अकसर छाया से निष्ठा के बारे में बातें किया करते थे। कई बार उन्होंने निष्ठा के पिता के बारे में कुरेदने की कोशिश भी की, पर छाया हमेशा टालती रहती।
इस दफ्तर में नौकरी ग्रहण करते वक्त छाया ने अपने पति का नाम ‘सिद्धेश्वर दयाल’ लिखवाया था, जो कि दरअसल अंबर के बचपन का नाम था। आज तक दफ्तर में कोई नहीं जानता था कि प्रसिद्ध कवि और साहित्यकार अंबर श्याम (जो कि ‘सिद्धेश्वर दयाल’ का उपनाम था) ही छाया के पति हैं। यह निर्णय बीस साल पहले शांति प्रकाशन में नौकरी लेते वक्त छाया ने अंबर के स्वाभिमान को मद्ïदेनजर रखते हुए लिया था। वह अंबर के स्वभाव से भलीभाँति परिचित थी, दुनिया को यह बताकर कि इतने बड़े साहित्यकार की पत्नी एक प्रूफ रीडर के पद पर नौकरी कर रही है, वह उनके अभिमान को ठेस पहुँचाना नहीं चाहती थी। अंबर भी यही चाहते थे यही कारण था कि इन बीस बरसों में छाया ने अपने दफ्तर में काम करनेवाले सहयोगियों से खास दोस्ताना और मेल-मिलाप भी नहीं रखा था। निष्ठा और अविनाश की दोस्ती हो जाने पर तो छाया और भी ज्यादा सतर्क हो गई थी। उसे डर था कि कहीं अंबर के स्वाभिमान व बददिमागी से जुड़ी खबरें और प्रवीणा के साथ उनके संबंधों का कड़वा सच निष्ठा और अविनाश के रिश्ते को ग्रस न ले। इसलिए रवि राय के बार-बार कुरदने पर भी वह निष्ठा के पिता के बारे में बात करने से हिचकिचाती रही। अविनाश भी निष्ïठा के पिता का नाम सिद्धेश्वर दयाल ही जानते थे और अब तक उन्होंने ये अनुमान तो लगा ही लिया था कि निष्ïठा के पिता काम के सिलसिले में ज्यादातर दिल्ली से बाहर ही रहते हैं।
एक दिन निष्ठा के एम.ए. फाइनल ईयर का नतीजा निकल आया। निष्ठा ने प्रथम श्रेणी में हिंदी साहित्य में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त की। उस शाम अविनाश इस खुशी का जश्न मनाने के लिए निष्ठा के लाख मना करने पर भी उसको पाँच सितारा होटल में खाना खिलाने ले गया। दरअसल, निष्ठा महँगे होटलों में जाने के बजाय ढाबों और कॉफी-होम्स में जाना पसंद करती थी। इतना ही नहीं बल्कि निष्ठा ने यह भी नियम बनाया कि वे दोनों बारी-बारी से चाय-पानी का बिल चुकता करेंगे। अविनाश—जो अब तक निष्ठा की खुद्ïदारी से अच्छी तरह परिचित हो चुका था—ने निष्ठा के इस नियम का विरोध नहीं किया।
होटल के रेस्टोरेंट में निष्ठा को बैठाकर जब अविनाश वॉशरूम गया तब वहाँ कोई एक और सज्जन भी हाथ धोने आए। अविनाश को उनका चेहरा कुछ जाना-पहचाना सा लगा। उसने मन-ही-मन बुदबुदाया, ‘कहाँ देखा है इन्हें…कुछ याद नहीं आ रहा…।’ फिर बाहर आकर अपने दिमाग पर जोर डाला तो उसे याद आया कि उन जनाब की शक्ल प्रसिद्ध कवि अंबर श्याम जैसी है। हालाँकि अविनाश का कभी भी उनसे साक्षात्कार नहीं हुआ था, पर उनकी तसवीर उसने कई बार अखबारों और पत्रिकाओं में देखी थी, उसी वजह से उसने यह अंदाजा लगाया। पर अविनाश को अपने अनुमान पर पूरी तरह विश्वास न था। कहीं उसे भ्रम तो नहीं हुआ। इसकी पुष्टि करने के लिए अविनाश ने नम्रतापूर्वक उन सज्जन से ही पूछ लिया, ”क्या आप प्रसिद्ध साहित्यकार अंबर श्यामजी ही हैं?”
उस सज्जन ने रूमाल से अपना मुँह पोंछते हुए ‘हाँ’ में उत्तर दिया। अविनाश की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने सोचा कि आज के दिन निष्ठा के लिए उसके प्रिय लेखक से साक्षात्कार कराने से बड़ा तोहफा कुछ और हो ही नहीं सकता।
अविनाश ने विनम्रता से हाथ जोडक़र अंबर से प्रार्थना की—”सर, क्या आप लॉबी में कुछ पल रुक सकते हैं?”
अंबर के चेहरे पर आए प्रश्नचिह्नï देखकर अविनाश ने अपने कथन की पुष्टि करते हुए कहा, ”मेरी मित्र आपकी बहुत बड़ी फैन है। आपके दर्शन कर उसे अत्यंत खुशी मिलेगी और उसे खुश देखकर मुझे जो खुशी मिलेगी, उसके लिए मैं आपका आजीवन आभारी रहूँगा।”
”भाई, अगर ऐसी बात है तो ठीक है, मिल लेते हैं आपके मित्र से।” अंबर ने मुसकराकर उत्तर दिया।
अविनाश लपककर निष्ठा को बुलाने चला गया।
वहाँ निष्ठा टेबल पर अविनाश का बेसब्री से इंतजार करती नजर आई। अविनाश को देखकर नाराजगी जताते हुए बोली, ”क्या अवि, इतनी देर लगा दी! पेट में चूहे कूद रहे हैं।”
अविनाश ने कुछ कहे बिना निष्ठा का हाथ थाम उसे कुरसी से उठाते हुए कहा, ”चलो जल्दी, तुम्हारे लिए बहुत बढिय़ा सरप्राइज है।”
”अवि, कहाँ ले जा रहे हो? वेटर खाना लेकर आता ही होगा।”
”अरे, तुम चलो तो।”
अविनाश ने निष्ठा को होटल की लॉबी में लाकर अंबर के सामने खड़ा कर दिया और कौतूहल से कहा, ”ये देखो, कौन हैं? तुम्हारे प्रिय कवि अंबर श्यामजी! है न बढिय़ा सरप्राइज!”
अंबर को देखते ही निष्ठा के पैरों से जैसे जमीन ही खिसक गई हो। दूसरी तरफ अंबर के भी होश उड़ गए। चेहरे पर चिंता, हैरानी और स्तब्धता के भाव लिये उन्होंने कडक़ जुबान में निष्ठा से पूछा, ”तुम, यहाँ! और ये कौन है? लगता है, तुम्हारी माँ ने कुछ ज्यादा ही आजादी दे दी है तुम्हें।” अविनाश की ओर इशारा करते हुए गुस्से से अंबर ने पूछा।
अविनाश हैरान खड़ा था। निष्ठा का चेहरा गुस्से से तमतमा गया। पर इससे पहले कि वह अपनी आंतरिक प्रतिक्रिया जुबान पर ला पाती, एक बेहद आकॢषत सुंदरी, जो उम्र में अंबर से काफी छोटी लग रही थी, ने आकर अंबर की बाँह में बाँह डालते हुए कहा, ”चलिए अंबर, मुशायरा शुरू होने का समय हो गया है। ऊपर हॉल में सब आपकी राह देख रहे हैं।”
महिला के स्वर में अपनेपन और हाॢदकता की झलक देख निष्ठा को समझने में देर न लगी कि वह महिला प्रवीणा के अलावा और कोई नहीं है। निष्ठा ने घृणित नजरों से प्रवीणा को देखते हुए अंबर को उत्तर दिया, ”मुझसे कोई भी सवाल पूछने का अधिकार आप खो चुके हैं। रही बात मेरी आजादी और सीमाओं की, तो उसकी चिंता आप न ही करें तो अच्छा होगा।”
अंबर आगबबूला हो उठे, पर निष्ठा ने उन्हें कुछ बोलने का मौका ही नहीं दिया और अविनाश की बाँह थामे वहाँ से सीधा बाहर निकल आई। अविनाश घोर सकते में था कि आखिर यह सब क्या हुआ? निष्ठा और अंबर श्याम के बीच हुई बहसा-बहसी के पीछे क्या राज है?
अंबर हारे हुए खिलाड़ी की तरह हड़बड़ाते हुए प्रवीणा से बोले, ”बिलकुल माँ जैसे तेवर हो गए हैं निष्ठा के।”
”नासमझ है निष्ठा, अभी बच्ची ही तो है आखिर! उसका कहा आपको दिल पर नहीं लेना चाहिए। अब चलिए भी अंबरजी, और देर करना ठीक न होगा।” प्रवीणा ने सहानुभूति दिखाते हुए उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा।

वहाँ अविनाश की कार सडक़ पर तेजी से दौड़ी जा रही थी। निष्ठा गाड़ी चलाते अविनाश की बगल में चुपचाप बुत बनी बैठी रही। उसके भीतर जलते ज्वालामुखी की लपटों ने उसके चेहरे को सुर्ख बना दिया था।
अविनाश लगातार पूछ रहा था, ”कुछ तो बताओ निष्ठा, आखिर बात क्या है? जिन महापंडित को तुम अपनी लेखन कला का आदर्श मानती हो, आज उन्हीं से इस प्रकार का व्यवहार मेरे लिए पहेली बना हुआ है अब तक। मैं तो तुम्हें उनसे मिलवाकर खुश देखना चाहता था, पर…”
”अवि, वो मेरे पिता हैं। पर अब उसी महिला के साथ रहते हैं।” निष्ठा ने कँपकँपाते होंठों से कहा।
”यह क्या कह रही हो, निष्ठा? अंबर श्यामजी तुम्हारे पिता…!”
घोर अचंभे में अविनाश का पैर गाड़ी के ब्रेक पर पड़ा और साठ की रफ्तार पर चलती गाड़ी अचानक जोर के झटके के साथ बंद हो गई। झटका इतना तेज था कि अविनाश और निष्ठा का सिर गाड़ी के डैशबोर्ड पर लगते-लगते बचा। अविनाश ने गाड़ी को सडक़ के किनारे ले जाकर बंद किया और सहानुभूति जताने के उद्ïदेश्य से निष्ठा का हाथ अपने हाथ में लेकर बोला, ”आई एम सॉरी टू लर्न दिस।”
निष्ठा ने अपनी आँसू भरी आँखों को मूँदकर लंबी साँस ली।
अविनाश ने उसका चेहरा उठाते हुए कहा, ”आज इन आँसुओं को बहने से मत रोको, निष्ठा! अपने अंदर सुलगे हुए ज्वालामुखी को फट जाने दो। मुझ पर विश्वास रखो निष्ठा, मैं तुम्हें कभी टूटने नहीं दूँगा। कदम-से-कदम मिलाकर हर दुविधा, हर विपदा का सामना करने में साथ दूँगा तुम्हारा।”
निष्ठा अपने आपको अब और सँभाल न सकी। उसकी भावनाओं का बाँध टूट गया और वह अविनाश के कंधे पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोती रही। अविनाश चुपचाप उसका सिर सहलाता रहा।
कुछ वक्त रो लेने के बाद निष्ठा का मन जब हलका हुआ तब उसने कहा, ”अवि, विश्वास नहीं होता कि यह वही व्यक्ति हैं, जिन्होंने कभी मेरी माँ के साथ सात जन्मों तक साथ रहने का प्रण किया था…पवित्र अग्नि को साक्षी बनाकर अपनी जीवनसंगिनी बनाया था उन्हें, और आज वही उनसे इतनी घृणा करके दूसरी औरत के पास चले गए। यकीन नहीं होता अवि, कि यह मेरे वही पापा हैं जो बचपन में मेरे बीमार होने पर पूरी-पूरी रात मुझे गोद में उठाकर टहलते थे और आज घर छोड़ते वक्त उन्हें मेरा खयाल तक नहीं आया! कोई पुरुष कैसे अपने स्वार्थ में एक पति और पिता के कर्तव्य को भूल सकता है अवि, कैसे?”
अविनाश बिना टिप्पणी किए धैर्यवान्ï श्रोता बना निष्ठा को सहलाता रहा, जब कि निष्ठा की भावनाएँ भीषण बाढ़ के पानी की तरह बहती रहीं। उसे बचपन में पिता की छाया में बिताए हर पल, माँ के प्रति बढ़ती अपने पिता की कड़वाहट, दरार और अंत में हाल ही में उनका घर छोड़ जाना—एक के बाद एक सिनेमा के दृश्य की तरह याद आते गए और वह उन यादों को शब्दों में बयान करती चली गई।
”अब तुम ही बताओ अवि, इन परिस्थितियों में मेरा प्यार और संबंधों पर से विश्वास उठना क्या स्वभाविक नहीं है?”
”मैं समझ सकता हूँ, निष्ठा। तुम्हारी हर बात, हर भावना, तुम्हारा मर्द जाति से घृणा करना, तुम्हारी सूनी आँखें और उदासीनता सब पहेलियाँ सुलझ गई हैं मेरी। तुम्हारे व्यवहार के पीछे छिपे कारणों की गुत्थी आज अपने आप सुलझ गई है, लेकिन एक दोस्त होने के नाते एक सुझाव देना चाहूँगा।”
”कैसा सुझाव?”
”पति-पत्नी के बीच इस प्रकार की अनबन होना कोई अनूठी बात नहीं है। पर उनकी संतान होने के नाते तुम्हारी भी तो जिम्मेदारी बनती है कि उनके प्रति नाराजगी या शॄमदगी दरशाने के बजाय तुम निरपेक्ष होकर उन दोनों की समस्याओं के पहलू को समझने की कोशिश करो। हो सके तो उनके बीच बनी दूरियों को मिटाने की चेष्टा करना भी तुम्हारा ही कर्तव्य है, निष्ठा!”
”पर जो रिश्ता खोखला हो चुका है, उसको फिर से खड़ा करने की कोशिश करना भी बेकार है। इतना तो समझती हूँ कि मेरे पापा नफरत करते हैं मेरी माँ से और यह मुझसे बरदाश्त नहीं होता। इसके लिए मैं उन्हें कभी माफ नहीं कर पाऊँगी। इसलिए इस बारे में बात करना भी बेकार है।”
अविनाश कुछ पल के लिए चुप हो गंभीरतापूर्वक सोचता रहा…फिर उसने मन-ही-मन कहा, ‘तुम्हारा रिश्तों पर से उठा हुआ यह विश्वास वापस अंकुरित करने का मैं पूरा प्रयास करूँगा, निष्ठा…हमेशा तुम्हारे जीवन को खुशियों से भरने की कोशिश करता रहूँगा; पर तुमको मुझपर भरोसा रखना होगा निष्ठा।’
दोनों के बीच बनी चुप्पी को निष्ठा ने ही तोड़ा, ”लग रहा है कि मेरी पारिवारिक वास्तविकता जानकर तुमको निराशा हुई!”
”हाँ, निराशा तो हुई है; लेकिन इसलिए नहीं कि तुम्हारी परिस्थितियाँ असामान्य हैं, पर इसलिए कि तुमने कभी मुझे इस लायक नहीं समझा कि मैं तुम्हारा दु:ख समझने के काबिल हूँ…नहीं तो तुम अब तक अकेले यह दर्द न सहती रहतीं, मुझसे भी बाँटतीं।”
”मैं कभी साहस नहीं जुटा पाई कि अपने जीवन का यह कड़वा पहलू तुम्हारे सामने जाहिर कर सकूँ—और कहती भी किस मुँह से? एक बेटी के लिए यह अत्यंत शर्मनाक परिस्थिति है कि उसके पिता किसी दूसरी औरत के साथ रहते हैं। माँ और मैं तो कितने अरसे से ये बात अपने सीने में छिपाए बैठे हैं।”
”तुमने शायद मुझे अब तक अपना समझा ही नहीं है, निष्ठा। मैंने तुमसे प्यार किया है, तुम्हारी परिस्थितियों से नहीं। ये सब जानकर तुम्हारे प्रति मेरी भावनाएँ क्यों बदलेंगी भला! पर दोस्त होने के नाते यह जरूर कहना चाहूँगा कि तुम्हें अपने पिता की करनी पर शॄमदा होने की कोई जरूरत है ही नहीं, न मेरे सामने और न ही दुनिया के सामने। तुम्हारे पिता ने अपनी जिंदगी के बारे में जो भी फैसला किया हो, उसमें तुम्हारा क्या कसूर!”
अविनाश की यह ज्ञानता और सहिष्णुता देख निष्ठा स्तब्ध सी उसे देखती रही। फिर मन-ही-मन बोली कि ‘न जाने कितने और गुणों का भंडार छिपा है तुम्हारे अंदर अविनाश! तुम सच में अनुपम और बेजोड़ हो। न जाने हर हालात को सकारात्मक नजरिए से देखने की इतनी क्षमता कहाँ से लाते ही तुम!’
निष्ठा की चुप्पी देख अविनाश ने कहा, ”कहीं तुम्हें यह तो नहीं लग रहा कि कुछ ज्यादा ही ज्ञान देने लगा हूँ मैं आजकल।”
”ऐसा मत सोचो, अवि! तुम्हारे हर तथ्य पर विचार करूँगी मैं। थैंक्स ऐनीवेस। अब घर चलें?”
”और पेट में जो चूहे कूद रहे हैं, उनको शांत कैसे करेंगे?”
”सॉरी अवि, मेरे कारण तुम्हें भी होटल से भूखा ही आना पड़ा, चलो, कहीं चलकर खा लेते हैं।”
”नहीं भाई, घर ही चलो। छाया आंटी के हाथों से बनी प्याज की पकौड़ी और पुदीने की चटनी खाकर ही अब तो यह भूख मिटेगी।”
”ठीक है, घर चलते हैं।”

अविनाश निष्ठा को लेकर उसके घर पहुँचा। उसने बिलकुल बच्चों की तरह प्यार से छाया से प्याज की पकौड़ी बनाकर खिलाने की गुजारिश की। छाया ने भी प्रेमत्व के साथ निष्ठा और अविनाश को ढेर सारी पकौडिय़ाँ खिलाईं, लेकिन इस दौरान उसने महसूस किया कि निष्ठा कुछ खोई-खोई सी है। अविनाश ने भी निष्ठा का खोयापन और परेशानी महसूस की। वह जानता था कि कुछ देर पहले अंबर और प्रवीणा के साथ हुआ आमना-सामना अभी तक निष्ठा के जहन से निकला नहीं है। इसलिए वहाँ से जाते वक्त उसने चुपचाप निष्ठा के कान में कहा कि अंबरजी से हुई बहसा-बहसी के बारे में वह अपनी माँ से कुछ न कहे, क्योंकि उन्हें दु:ख होगा। निष्ठा ने भी उसे आश्वासन दिलाते हुए सिर हिलाया।

अविनाश के वहाँ से जाने के बाद छाया ने चिंता दिखाते हुए बेटी से पूछा, ”कुछ झगड़ा हुआ है क्या अविनाश के साथ तुम्हारा? देख रही हूँ, जब से आई हो, कुछ खोई-खोई सी हो।”
”माँ, मैंने आज अविनाश को पापा के बारे में सब बता दिया।”
”क्या कह रही हो, निष्ठा?” सुनकर छाया का दिल ही बैठ गया।
”हाँ माँ, कुछ हालात ही ऐसे हो गए कि मुझे बताना पड़ा।”
”चलो, ठीक ही किया…वैसे तो एक-न-एक दिन मैं ही बताने वाली थी उसे। अच्छा हुआ, तूने बता दिया। उसके व्यवहार से तो ऐसा कुछ नहीं लगा कि वो हमारे जीवन का इतना बड़ा सच जान चुका है। पर सच सुनने के बाद अविनाश की प्रतिक्रिया क्या थी?” छाया ने गंभीरता से पूछा।
”अवि को दु:ख हुआ कि मैंने उन्हें पहले क्यों नहीं बताया। कहने लगे कि मैंने उनको इस लायक भी नहीं समझा कि उनसे अपना दु:ख बाँट सकूँ।” निष्ठा ने भरे गले से कहा।
”अंबर और प्रवीणा के रिश्ते के बारे में भी बताया तूने?” छाया कुछ सोचकर बोली।
”जी…पर माँ, अविनाश ने जिस सहिष्णुता से इस यथार्थ को लिया और समझा, उससे मेरे मन में उनका सम्मान और भी बढ़ गया है।”
”भला लडक़ा है अविनाश। मैं तो हमेशा से कहती आ रही हूँ तुझे कि वह अन्य लडक़ों से अलग है।”
”माँ, लग रहा है, अविनाश से सच्ïचाई बाँटकर आज मन से बहुत बड़ा बोझ उतर गया है।”
”बेटा, इस हिसाब से तो तुम्हारा मन अब शांत होना चाहिए; पर तुम्हारे चेहरे पर आए भावों से तो लग रहा था कि तुम्हारे भीतर कुछ खलबली मच रही है। कुछ तो है, जो तुम्हें परेशान कर रहा है। क्या कुछ छिपा रही हो मुझसे?”
”हाँ माँ, परेशान तो हूँ मैं। लेकिन उसका अविनाश से कुछ सरोकार नहीं है।”
”तो फिर किससे सरोकार है? देख बेटी, पहेलियाँ मत बुझा। मेरा दिल बैठा जा रहा है।”
”माँ, मैं दरअसल पापा और आपके नदारद रिश्ते को लेकर परेशान हूँ। माँ क्यों नहीं अपने आपको इस परिशून्य-बंधन से मुक्त कर लेतीं? आपके पति जिस रास्ते पर चल चुके हैं, वहाँ से उनके वापस आने की उम्मीद करना भी फिजूल है।”
छाया ने पल भर के लिए लंबी साँस भरी, फिर अपने अंदर से आनेवाली सिसकियों की आवाज को नियंत्रित करते हुए बोली, ”मानती हूँ, तुम्हारे पिता भटक गए हैं, पर मुझे अब भी अपने सच्चे प्रेम पर भरोसा है। मुझे विश्वास है कि एक-न-एक दिन उन्हें भी इस बात का एहसास जरूर होगा। पर पता नहीं उनका अहं पिघलकर उन्हें वापस आने देगा या नहीं।”
”हैरत होती है माँ, कि इतना कुछ हो जाने के बाद भी आपको ‘प्रेम’ जैसे शब्द पर भरोसा है।”
”मानती हूँ कि हमारा प्यार जिंदगी की चुनौतियों में कहीं गुम हो गया है। अंबर के बारे में तो नहीं, पर कम-से-कम अपने बारे में कह सकती हूँ कि जीवन में पहले प्यार का जो एहसास उन्होंने करवाया था, वह दोबारा कभी न होगा मुझे। जो स्थान मेरे दिल में अंबर ने लिया था, वह स्थान आजीवन कोई और ले ही नहीं पाएगा।”
”आपकी जगह मैं होती तो इन परिस्थितियों में जरूर तलाक देकर अपने आपको मुक्त कर लेती अब तक, इस खोखले रिश्ते से।”
”मुझे नहीं लगता बेटा, कि तलाक के कागजों पर किए हस्ताक्षर की स्याही मेरे दिलो-दिमाग पर छपी मेरे प्यार की सुहानी यादों को पोत पाएगी।”
”पता नहीं आप किन यादों की दुहाई दे रही हैं, माँ। मैंने तो जब से होश सँभाला है, आप दोनों के बीच एक अजीब से तनाव और कड़वाहट को ही महसूस किया है। मैं तो अनुमान भी नहीं लगा सकती कि आप दोनों ने कभी एक-दूसरे को सच्चा प्रेम किया होगा।”
छाया ने आँख मूँदकर अतीत के पन्ने पलटे, फिर हलका सा मुसकराकर बोली, ”तुम्हें विश्वास दिलाना ही पड़ेगा कि तुम्हारे माँ-बाबा को भी किसी जमाने में प्यार हुआ था…हालाँकि पहले भी कई बार तुमने इस मुद्ïदे को छेड़ा है, पर मैं हमेशा टालती रहती थी; लेकिन अब लगता है, तुम्हें बताना जरूरी हो गया है…”
छाया आकर बिस्तर पर लेट गई। निष्ठा भी छाया के पेट को तकिया बनाकर उलटा लेट गई और उत्सुकता से माँ के बोलने का इंतजार करने लगी। छाया ने यादों की डायरी के पन्ने पलटते हुए अपनी कथा-कहानी आरंभ की—
”मैं जब एम.ए. के फाइनल ईयर में थी, एक दिन अंबर हमारे विश्वविद्यालय में आयोजित गोष्ठी के मुख्य वक्ता बनकर आए थे। हिंदी साहित्य की छात्रा होने के नाते मुझे भी उन्हें सुनने का अवसर मिल गया था।”
निष्ठा ने गौर किया कि अतीत के पन्ने पलटते वक्त छाया की आँखों में अचानक अद्भुत चमक और होंठों पर मुसकराहट छा रही थी।
छाया ने अपनी कहानी आगे बढ़ाते हुए कहा, ”प्रोग्राम के अंत में प्रश्नोत्तर काल के दौरान मैंने अपने स्थान पर खड़े होकर चुलबुल अंदाज में उनसे पूछा कि सर, हालाँकि मैं आपकी कला की भारी प्रशंसक हूँ, पर क्या आपको नहीं लगता कि यदि आप अपनी काव्य रचनाओं में सरल भाषा का प्रयोग करें तो आपके विचारों की खूबसूरती अधिकाधिक लोग सराह पाएँगे।”
निष्ठा को छाया की यह बात सुनकर बेहद हैरानी हुई और उसने विस्मय प्रकट करते हुए कहा, ”बाप रे! यकीन नहीं होता, आपमें इतनी हिम्मत थी उस वक्त, कि उन पर सीधा प्रहार कर डाला। अच्छा बताइए, पापा ने क्या उत्तर दिया?”
छाया ने मुसकराकर कहा, ”अरे, वो तो गुस्से में लाल-पीले हो गए और कडक़ स्वर में बोले कि मैं भाषा की विशिष्टता और शुद्धता बनाए रखने में विश्वास रखता हूँ और इस क्षेत्र में कोई समझौता नहीं करना चाहूँगा। लोगों को अपनी समझ और ज्ञान का दायरा बढ़ाना होगा, अगर वे मेरी रचनाओं में रुचि रखते हैं और उन्हें पढऩा व सुनना चाहते हैं। उनके इस उत्तर से मैं अवाक्ï रह गई, पर पूरा हॉल उनके विचारों की प्रसन्नता में तालियों की गडग़ड़ाहट से गूँज उठा। मुझे अपनी नादानी पर बेहद खेद और शर्म महसूस हुई और मैंने तुरंत माफी माँगते हुए अपने कहे शब्द वापस लिये।”
”पर आपके माफी माँगने के बाद तो पापा का गुस्सा शांत हो ही गया होगा?”
निष्ठा के इन शब्दों में उपहासता की झलक थी, क्योंकि वह अपने पिता की कमजोरी से परिचित थी और जानती थी कि वह किसी भी सूरत में अपनी आलोचना बरदाश्त नहीं कर सकते। निष्ठा की अंबर के स्वभाव के प्रति नकारात्मक प्रतिक्रिया शायद छाया के कानों तक पहुँची ही नहीं, क्योंकि छाया अतीत की सुखद यादों के नशे में पूरी तरह डूबी हुई थी।
उन्हीं पलों की धुन में लुप्त छाया ने अपने अतीत की कहानी को आगे बढ़ाते हुए कहा, ”आश्चर्यजनक बात तो यह है कि उस दिन कॉलेज का हॉल छोड़ते समय अंबर ने अपनी पुस्तक का नवसंस्करण मुझे देते हुए कहा कि साहित्य की सुबोध छात्रा होने के नाते तुम्हें इस पुस्तक को पढऩा चाहिए। हाँ, लेकिन पढऩे के बाद इस पते पर आकर मुझे लौटा देना। उन्होंने अपने कुरते की जेब से एक विजिटिंग कार्ड निकालकर मुझे दे दिया। मैं गद्गद हो उठी थी, क्योंकि उनका मेरे प्रति खास व्यवहार संकेत था कि वे मेरे प्रश्न पूछने की वजह से कम-से-कम नाराज तो नहीं थे।”
निष्ठा को लगा जैसे वह साक्षात्ï कोई पुरानी क्लासिक हिंदी फिल्म देख रही हो। उसने आगे जानने की उत्सुकता जताते हुए पूछा, ”फिर क्या हुआ, माँ?”
”होना क्या था, मैं सातवें आसमान पर थी उस वक्त। देश के मानी-ज्ञानी सुडौल नौजवान काव्य पंडित ने स्वयं अपने हाथों से मुझे अपनी रचनाएँ पढऩे को दीं, यह कोई छोटी-मोटी बात तो न थी मेरे लिए! कॉलेज की बाकी छात्राएँ तो जैसे ईष्र्या के मारे जल-भुन गई थीं। मैंने पूरी रात जागकर वह पुस्तक पढ़ डाली और अगले ही दिन उसे लौटाने उनके दिए हुए पते पर पहुँच गई। दरवाजे की घंटी बजाई तो अंबर ने ही दरवाजा खोला। उन्हें उस हाल में देखकर अजीब लगा। मन तो किया कि जोर से हँस दूँ, पर किसी तरह अपने पर काबू पाकर खड़ी रही।”
निष्ठा ने भोले भाव से पूछा, ”अजीब क्या लगा, माँ?”
”अरे, इतने विद्वान्ï पुरुष का चेहरा शेविंग क्रीम से पुता हुआ हो और वह सिर्फ तौलिया बनियान पहने आपके सामने खड़ा हो तो देखकर अटपटा नहीं लगेगा क्या?” छाया ने साड़ी के पल्लू से अपनी हँसी दबाते हुए उत्तर दिया।
”अटपटा तो उन्हें भी लगा होगा ना, माँ?”
”हाँ, लगा तो था, तभी मुझे देखते ही उलटे पाँव दौडक़र बाथरूम की तरफ भाग गए थे।”
”वाह, क्या दृश्य रहा होगा! आप तो तुरंत वापस आ गई होंगी?”
”ऐसे कैसे आ जाती! मैंने अपनी छोटी सी जेबखर्ची के पैसों से उनके लिए एक महँगा सा पेन खरीदा था, उसे उन्हें भेंट दिए बिना कैसे आ जाती। मैं चुपचाप जाकर कमरे में बैठकर उनका इंतजार करने लगी।”
”यकीन नहीं हो रहा कि आप जवानी में इतनी शैतान और चुलबुली रही होंगी। खैर, पापा ने आपकी भेंट स्वीकार कर ली थी क्या? जहाँ तक मैं उन्हें समझती हूँ, वह न भेंट लेने और न ही देने में विश्वास रखते हैं।”
छाया ने हँसकर कहा, ”जब वे तैयार होकर कमरे में आए और मैंने उनकी पुस्तक लौटाते हुए पेन भेंट किया तो उन्होंने मुसकराते हुए धन्यवाद दिया और तुरंत पेन को अपने कुरते की ऊपरवाली जेब पर लटका लिया, यह कहते हुए कि वैसे तो मैं किसी से भी भेंट स्वीकार नहीं करता, पर तुम्हारी इस भेंट को लौटाकर मैं सरस्वती माँ का निरादर नहीं कर सकता। पर ये बताओ कि एक ही रात में पुस्तक पूरी पढ़ ली या फिर यों ही लौटा रही हो? जब मैंने बताया कि मैंने उनकी रची एक-एक रचना को न केवल पढ़ा बल्कि सभी का लुत्फ भी उठाया, तब उनको विश्वास ही नहीं हुआ।”
”ओह माँ! सच में काफी रोमांचक है आपकी प्रेमकथा।”
छाया ने होंठों पर मुसकराहट लाते हुए अपनी कहानी को आगे बढ़ाया, ”इसके बाद किसी-न-किसी बहाने हम दोनों मिलते रहे। पता ही नहीं चला, कब हम दोनों के मन में प्रेम का बीज अंकुरित हो गया।”

अगली सुबह चाय का पहला प्याला पीते वक्त निष्ठा ने छाया से पूछा—
”माँ, मैं रात भर यह सोचती रही कि क्या पापा भी आपको उतना ही प्यार करते थे, जितना आप उन्हें चाहती थीं?”
”शायद मुझसे भी ज्यादा। कलाकार अत्यंत भावुक प्रवृत्ति के होते हैं। अंबर भी मेरे मामले में बहुत भावुक होते चले गए। वो मुझे उसी पहनावे और रूप में देखना चाहते थे, जिसकी कल्पना उन्होंने अपने जीवनसाथी के रूप में की होगी। मेरा सलवार-सूट पहनना उन्हें भाता नहीं था। एक दिन उन्होंने मुझे लाल बॉर्डरवाली सफेद सूती साड़ी भेंट की और पहनकर दिखाने को कहा। साड़ी पहनकर जब मैं उनके सामने आई तो उन्होंने मेरे माथे पर लाल बिंदिया लगाते हुए कहा—अब से इसी तरह तैयार होकर रहा करो। अच्छी लगती हो।”
निष्ठा ने गौर से देखा और उसे अच्छा भी लगा, यह देखकर कि यह वाकया बयान करते वक्त छाया के गालों पर लाज की लाली छा गई थी। छाया की इस रमणीय मनोदशा का लुत्फ उठाते हुए निष्ठा ने नटखट अंदाज में पूछा, ”क्या आजकल के जोड़ों की तरह उस जमाने में भी प्रेमी-प्रेमिका सिनेमाघर वगैरह जाते थे?”
”हाँ, जाते तो थे; पर अंबर को भीड़-भाड़ और सिनेमा देखना पसंद नहीं था। इसलिए हम दोनों अकसर किसी पार्क में जाकर बैठ जाते थे या ज्यादा-से-ज्यादा थिएटर में कोई अच्छा नाटक देखने चले जाते।”
”और फिर शायद पापा आपको किसी अच्छे से होटल में खाना खिलवाते होंगे।”
”ना रे बाबा! तू जानती तो है कि चाहे हमारे बीच कितना ही झगड़ा क्यों न हो जाए, खाना तो वह मेरे हाथ का बना ही खाते हैं। उस वक्त भी तेरे पापा का यही आलम था। इसलिए घूमने के बाद उनके घर जाकर मैं खुद खाना बनाकर खिलाती थी।”
”माँ, आपको बुरा नहीं लगता था। अच्छा-खासा रोमांटिक मूड बिगड़ जाता होगा?”
”लगता तो था, पर जब उनके मुँह से अपने बनाए खाने की तारीफ सुनती थी तो सारी बोरियत मिट जाती थी। भावुक हो जाती थी, जब वो मुझे अन्नपूर्णा कहकर बुलाते थे।”
”अच्छा माँ, यह बताओ कि शादी का प्रस्ताव आपका था या फिर पापा का?”
छाया निष्ठा का सिर सहलाते हुए बोली, ”ऐसे ही एक माॢमक क्षण में एक दिन अंबर ने मुझसे कहा कि मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि कभी मेरे मन में भी गृहस्थी बसाने की इच्छा जाग्रत्ï हो पाएगी। सोचता था कि आजीवन ब्रह्मïचारी रहकर सिर्फ कला की सेवा करता रहूँगा, क्योंकि अपनी कला के अलावा इस दुनिया के बारे में कुछ ज्ञान नहीं है मुझे। मेरी कला, मेरी कृतियाँ ही मेरी संपत्ति हैं बस! धन-दौलत और भौतिक सुख-सुविधाओं जैसी कोई संपत्ति नहीं जुटाई मैंने! क्या इन हालात के बावजूद तुम मेरी अर्धांगिनी बनना पसंद करोगी?”
”मुझे लगा, मानो एकाएक मेरे कदम सातवें आसमान पर आ खड़े हो गए। यह प्रस्ताव मेरे लिए राष्ट्रीय पुरस्कार पाने से कम न था। मैंने तुरंत हामी भर दी।”
”क्या कह रही हो, माँ! नाना-नानी से इजाजत लिये बिना?”
”क्योंकि मुझे पूरा भरोसा था कि मेरी पसंद मेरे माँ-बाप की पसंद भी होगी। बस फिर क्या था, जैसे ही मेरे एम.ए. का नतीजा निकला वैसे ही मेरे माँ-बाबा तुम्हारे दादा-दादी से मिलने लखनऊ पहुँच गए। फिर बस कुछ ही हफ्तों में हमारा विवाह हो गया। हमारे माता-पिता ने मिलकर तोहफे में हमें यह मकान भेंट किया था और हम दोनों ने इसे सुखद घर में परिवॢतत करने का सपना भी देखा; पर…”
”पर क्या, माँ?”
छाया ने अपनी आँखें मूँद लीं, मानो अपनी शादी के बाद घटी अप्रिय घटनाओं को क्रमबद्ध याद करने की कोशिश कर रही हो। देखते-ही-देखते उसकी आँखों में से आँसुओं की धारा बहने लगी, जिसे देखकर निष्ठा की उत्सुकता और भी बढ़ गई और वह अपने आपको यह प्रश्न पूछने से रोक नहीं पाई कि आखिर ऐसा क्या हुआ उन दोनों के बीच कि आज वे दोनों एक छत के नीचे भी एक साथ नहीं रह सकते?
”आखिर पापा का आपके प्रति इतना प्रेम, घृणा में कैसे बदल गया?”